कोरबा(आधार स्तम्भ) : एसईसीएल के दो बड़े अधिकारियों ने एक रियल इस्टेट कारोबारी के साथ मिलकर सुनियोजित तरीके से 24 लोगों को झांसे में लिया। इनसे 2 करोड़ 28 लाख 81 हजार 197 रुपये की ठगी की गई है। आश्चर्यजनक है कि ऐसे गंभीर मामले में पर्याप्त प्रमाण होने के बावजूद पिछले दो माह से सिर्फ जांच ही हो रही है, कोई एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकी है। अब पीड़ितों ने पुलिस महानिदेशक से एफआईआर की गुहार लगाई है।
आवेदन में लेख है कि-
24 आवेदकगणों के द्वारा धर्मेंद्र कुमार सिंह (मुख्य प्रबंधक- खनन), रोहित कुमार जाटवर (रियल स्टेट कारोबारी) तथा द्वारिका प्रसाद टण्डन (वरिष्ठ प्रबंधक- मानव संसाधन) के झूठे बहकावे में आकर वर्ष 2024 में उनके बताए विभिन्न खातों में तथा नगद राशि सहित कुल 4,03,23,547/ (चार करोड़ तीन लाख तेईस हजार पांस सौ सैतालिस रुपये) प्रदान किया गया था। उन तीनों के बताए अनुसार निवेश की जाने वाली राशि 300 दिन में तीन गुणा होकर वापस देने की बात कही गई लेकिन 300 दिन पूर्ण होने तक हम 24 आवेदकगणों को कुल 1,74,42,350/- (एक करोड़ चौहत्तर लाख ब्यालिस हजार तीन सौ पचास रुपये) ही वापस किया गया। शेष राशि देने में पहले तो कुछ दिन तक समय मांगा गया, उसके पश्चात् उन सभी के द्वारा बचत रकम और अन्य लाभ देने से पूर्ण रुप से इंकार कर दिया गया। उपरोक्त संबंध में हम सभी 24 आवेदकणों के द्वारा धमेन्द्र कुमार सिंह, रोहित कुमार जाटवर एवं द्वारिका प्रसाद टण्डन के विरुद्ध थाना-कटघोरा जिला- कोरबा में दिनांक 25/02/2026 को शिकायत आवेदन देते हुवे उनके विरुद्ध एफ.आई.आर. दर्ज किये जाने हेतु निवेदन किया गया तथा उक्त आवेदन की प्रतिलिपी पुलिस महानिदेशक-रायपुर, पुलिस महानिरीक्षक-बिलासपुर रेंज तथा पुलिस अधीक्षक कोरबा को प्रेषित किया गया।
थाना- कटघोरा के द्वारा 02 माह की अवधि में केवल कुछ आवेदकगणों का बयान ही दर्ज किया जा सका है, किन्तु हमारे शिकायत पर अभी तक उक्त तीनों आरोपीगण के विरुद्ध एफ.आई.आर. दर्ज नहीं किया गया है जिससे उन सभी आरोपीगण का मनोबल बढ़ा हुआ है तथा वे हम आवेदकगणों के अलावा आस-पास के अन्य लोगों को भी अपने झांसे में लेकर आर्थिक लाभ / आर्थिक अपराध जारी रखे हुवे हैं। डीजीपी से आग्रह किया गया है कि संबंधितों के विरुद्ध तत्काल F.I.R. दर्ज किये जाने हेतु संबंधित थाना कटघोरा जिला- कोरबा को आदेशित करने की कृपा करें।
एक पुलिस अधिकारी की भूमिका चर्चा में
चर्चा में न सिर्फ इस मामले में बल्कि थाना क्षेत्र अंतर्गत होने वाले शिकायत संबंधी खासकर आर्थिक अपराध से जुड़े अन्य मामलों में अधीनस्थ एक अधिकारी की भूमिका काफी चर्चा में है। स्थानीय सूत्र की मानें तो अधीनस्थ के द्वारा ऐसे मामलों में आवेदन आने पर उसे दूसरी दिशा देने की कोशिश पहले की जाती है और इसके एवज में आर्थिक लाभ भी लिया जाता है। यह एक बड़ी वजह है कि थाना में आने वाले आर्थिक अपराध से संबंधित कई मामलों में पीड़ित पक्ष को न्याय नहीं मिल पा रहा और उन्हें शीर्ष अधिकारी के समक्ष अपनी गुहार लगानी पड़ती है। ऐसे कुछ मामले सामने आए हैं जिनमें नियमतः सीधे एफआईआर होनी चाहिए किंतु उन्हें भी उलझा कर रखा गया है और अनावेदक को लाभ पहुंचाने का कार्य किया जा रहा है। इस एक अधीनस्थ की वजह से उनके ऊपर के अधिकारी की भी छवि पर बट्टा लग रहा है। अब यह तो शीर्ष अधिकारी जाने कि पूरे राज से वह ज्ञात है या अनभिज्ञ…! कहा तो यह भी जा रहा है कि उनकी जानकारी के बगैर आखिर किसकी इतनी हिमाकत कि मामलों में लेन-देन कर लिया जाए। वैसे, तीन-चार मामलों में शिकायत तो ऊपर तक पहुंच चुकी है।



