50 सीटर आश्रम में 34 बच्चों की एंट्री, करीब 15 बच्चों का घर पर रहने का दावा; अधीक्षक की मूल पदस्थापना करतला में, बरपाली का अतिरिक्त प्रभार
बरपाली (आधार स्तंभ) : प्राथमिक स्तर आदिवासी बालक आश्रम बरपाली की व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। 50 सीटर आश्रम में रिकॉर्ड के अनुसार 34 बच्चों की एंट्री बताई जा रही है, जबकि आरोप है कि इनमें से करीब 15 बच्चे आश्रम में रहते ही नहीं हैं। बताया जा रहा है कि ये बच्चे उसी गांव के रहने वाले हैं और अपने घर पर खाना खाने के साथ-साथ रात भी घर पर ही बिताते हैं।
यदि यह आरोप सही साबित होता है तो सवाल सिर्फ बच्चों की एंट्री तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उनके नाम पर दर्ज भोजन, आवास और अन्य शासकीय सुविधाओं के रिकॉर्ड की भी जांच जरूरी हो जाएगी।
अधीक्षक की मूल पदस्थापना करतला में, बरपाली का अतिरिक्त प्रभार
मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। आश्रम के अधीक्षक राकेश कौशिक की मूल पदस्थापना पोस्ट मैट्रिक आदिवासी बालक छात्रावास करतला में बताई जा रही है, जबकि प्राथमिक स्तर आदिवासी बालक आश्रम बरपाली का उन्हें अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।
करतला और बरपाली के बीच लगभग 40 किलोमीटर की दूरी बताई जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि एक ही अधिकारी को इतनी दूरी पर स्थित दो संस्थानों की जिम्मेदारी किस आधार पर दी गई? क्या इस पद के लिए स्थानीय स्तर पर अन्य अधिकारियों/कर्मचारियों की उपलब्धता नहीं थी? क्या विभाग ने अतिरिक्त प्रभार सौंपने से पहले दोनों संस्थानों की भौगोलिक दूरी और प्रशासनिक आवश्यकता को ध्यान में रखा था? इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग से मिलना चाहिए।
करतला में भी उपस्थिति पर सवाल
स्थानीय जानकारी के अनुसार अधीक्षक राकेश कौशिक अपने मूल पदस्थापना स्थल करतला स्थित छात्रावास में भी नियमित रूप से नहीं जाते। अधीक्षक का निवास बिलासपुर है जो कि महीने में कभी कभार बिलासपुर से लोकल ट्रेन पकड़कर बरपाली आते हैं और शाम की ट्रैन से वापस अपने निवास बिलासपुर लौट जाते हैं। जबकि करतला स्थित छात्रावास जाना तो उनका नहीं के बराबर होता है। हालांकि इस दावे की पुष्टि विभागीय उपस्थिति रजिस्टर, निरीक्षण पंजिका और अन्य आधिकारिक रिकॉर्ड से की जानी चाहिए।
यदि एक अधिकारी अपने मूल पदस्थापन स्थल और अतिरिक्त प्रभार वाले आश्रम—दोनों जगह नियमित रूप से उपस्थित नहीं रहता है, तो विभागीय निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है।
विशेष लाभ दिए जाने की आशंका, जांच जरूरी
स्थानीय स्तर पर यह आशंका भी जताई जा रही है कि इतनी दूरी के बावजूद अतिरिक्त प्रभार दिए जाने के पीछे अधीक्षक राकेश कौशिक को विशेष लाभ पहुंचाने का उद्देश्य तो नहीं था। फिलहाल यह केवल आशंका है और इसकी पुष्टि किसी स्वतंत्र जांच अथवा विभागीय दस्तावेजों से ही हो सकती है।
इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि विभाग अतिरिक्त प्रभार से संबंधित आदेश, प्रस्ताव, नोटशीट तथा उस समय उपलब्ध अन्य पात्र अधिकारियों की जानकारी सार्वजनिक करे, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि नियुक्ति/प्रभार की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार हुई थी या नहीं।
बच्चों के नाम पर मिलने वाली सुविधाओं का भी हो भौतिक सत्यापन
करीब 15 बच्चों की कथित फर्जी एंट्री के आरोपों की सच्चाई जानने के लिए केवल कागजी जांच पर्याप्त नहीं होगी। प्रत्येक बच्चे का भौतिक सत्यापन, उसके वास्तविक निवास की पुष्टि और आश्रम में उसकी उपस्थिति की जांच आवश्यक है।
साथ ही भोजन पंजी, उपस्थिति रजिस्टर, प्रवेश रजिस्टर, राशन स्टॉक, खर्च के बिल-वाउचर और संबंधित भुगतान रिकॉर्ड का मिलान कराया जाना चाहिए। इससे यह पता चल सकता है कि आश्रम में वास्तव में कितने बच्चे रह रहे हैं और रिकॉर्ड में कितने दर्ज हैं।
विभाग की भूमिका भी जांच के दायरे में
पूरे मामले में सिर्फ अधीक्षक की भूमिका ही नहीं, बल्कि अतिरिक्त प्रभार देने वाले अधिकारी के निर्णय की भी जांच जरूरी है। आखिर करीब 40 किलोमीटर दूर पदस्थ व्यक्ति को बरपाली आश्रम का अतिरिक्त प्रभार देने का आधार क्या था?
यदि जांच में बच्चों की कथित फर्जी एंट्री, वास्तविक उपस्थिति में अंतर या शासकीय राशि के गलत उपयोग की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जानी चाहिए।
फिलहाल मामला गंभीर आरोपों और सवालों के घेरे में है। इन आरोपों की वास्तविकता विभागीय दस्तावेजों और निष्पक्ष भौतिक सत्यापन से ही सामने आएगी। अब देखना यह है कि विभाग मामले की निष्पक्ष जांच कराता है या फिर कागजी रिकॉर्ड को ही वास्तविकता मानकर आगे बढ़ जाता है।
कोरबा जिले के छात्रावासों और आश्रमों में अनियमितता, भ्रष्टाचार, शासकीय राशि का गबन, राशन खरीदी में घोटाला, बच्चों की फर्जी एंट्री, शराब सेवन आदि के ऐसे कई सारे और भी मामले जल्द ही उजागर होने की संभावना है…..इंतजार कीजिए…..




