नदी नहीं, रेत में बहती भक्ति : हथखोज के “सूखा लहरा“ की अनोखी परंपरा…

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महासमुंद (आधार स्तंभ) :  नदी के बहते पानी पर लोगों को लहरों की तरह बहते हुए आपने देखा होगा…लेकिन क्या आपने कभी सूखी रेत पर हजारों लोगों को लुढ़कते हुए देखा है? एक ऐसा दृश्य, जो आंखों को चौंका देता है और मन में सवाल खड़ा कर देता है – आखिर ये माजरा क्या है? आज हम आपको ले चलते हैं छत्तीसगढ़ के महासमुंद और गरियाबंद जिले की सीमा पर बसे हथखोज गांव, जहां आस्था, भक्ति और चमत्कार का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। महानदी के किनारे स्थित यह स्थल “सप्तधारा संगम” के नाम से जाना जाता है। यहां सरगी, केशवा, बघनई, सूखा नदी, पैरी, सोंढूर और महानदी – सात नदियों का मिलन होता है। मकर संक्रांति के पावन पर्व पर यहां लगता है घोंडुल मेला, और इसी दिन होती है एक अनोखी परंपरा – “सूखा लहरा”।

हजारों श्रद्धालु नदी की सूखी रेत पर पहुंचते हैं, शिव परिवार की प्राचीन पाषाण प्रतिमाओं के दर्शन करते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और फिर दंडवत होकर रेत पर लुढ़कते हुए आगे बढ़ते हैं – इसे ही कहा जाता है सूखा लहरा लेना।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि कई भक्तों का शरीर बिना किसी प्रयास के खुद-ब-खुद लुढ़कने लगता है। कभी-कभी तो सिर्फ हाथ लगाने भर से ही शरीर रेत पर तेजी से आगे बढ़ जाता है। श्रद्धालु इसे दैवीय शक्ति और भक्ति की महिमा मानते हैं। यह परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। दूर-दूर से लोग यहां मन्नत लेकर आते हैं और अपनी आस्था को इस अनोखे रूप में प्रकट करते हैं। हथखोज का “सूखा लहरा” केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और सामूहिक भक्ति का अद्भुत प्रतीक है। सूखी रेत पर लहराते हजारों श्रद्धालुओं का यह दृश्य वाकई हर किसी के लिए अविस्मरणीय बन जाता है।

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