50 सीटर आश्रम में 34 बच्चों की एंट्री, करीब 15 बच्चों के घर पर रहने का आरोप; 40 किलोमीटर दूर पदस्थ अधीक्षक को अतिरिक्त प्रभार देने पर भी उठे सवाल
बरपाली/कोरबा(आधार स्तंभ) : आदिवासी बालक आश्रम बरपाली में कथित फर्जी एंट्री और अधीक्षक को अतिरिक्त प्रभार दिए जाने को लेकर उठे सवालों पर अब तक विभागीय कार्रवाई या जांच शुरू होने की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। आधार स्तंभ द्वारा 4 अक्टूबर 2026 को इस मामले को प्रमुखता से प्रकाशित किए जाने के बाद भी यदि संबंधित विभाग की ओर से कोई ठोस पहल नहीं हुई है, तो यह विभागीय निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
खबर प्रकाशित, फिर भी जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी क्यों?
प्राथमिक स्तर आदिवासी बालक आश्रम बरपाली में कथित अनियमितताओं को लेकर पहले ही सवाल उठाए जा चुके हैं। प्रकाशित खबर के अनुसार, 50 सीटर आश्रम में रिकॉर्ड पर 34 बच्चों की एंट्री बताई गई थी। आरोप है कि इनमें से करीब 15 बच्चे आश्रम में रहने के बजाय अपने घरों में ही रहते हैं।
यदि यह दावा सही है, तो मामले की जांच केवल उपस्थिति रजिस्टर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। बच्चों की वास्तविक उपस्थिति, भोजन व्यवस्था, राशन की खपत और संबंधित शासकीय खर्च का मिलान कराना आवश्यक है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि अभी निष्पक्ष जांच और विभागीय दस्तावेजों से होना बाकी है।
40 किलोमीटर दूर पदस्थ अधीक्षक को अतिरिक्त प्रभार क्यों?
मामले का दूसरा अहम पहलू अधीक्षक की पदस्थापना से जुड़ा है। प्रकाशित खबर के मुताबिक, अधीक्षक की मूल पदस्थापना पोस्ट मैट्रिक आदिवासी बालक छात्रावास करतला में बताई गई है, जबकि उन्हें प्राथमिक स्तर आदिवासी बालक आश्रम बरपाली का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया है। करतला और बरपाली के बीच लगभग 40 किलोमीटर की दूरी बताई जाती है।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि अतिरिक्त प्रभार देने का आधार क्या था? क्या विभाग ने दोनों संस्थानों की दूरी, नियमित निगरानी और बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर निर्णय लिया था? क्या संबंधित आदेश और उसकी प्रशासनिक आवश्यकता की समीक्षा की गई?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग को देना चाहिए।

आश्रम में कथित अनियमितताओं से संबंधित खबर सार्वजनिक होने और आदिवासी विकास विभाग के सहायक आयुक्त श्रीकांत कसेर के संज्ञान में लाये जाने के बाद भी अब तक उनके द्वारा जांच या निरीक्षण नहीं कराना कई शंकाओं को जन्म देता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि सहायक आयुक्त महोदय द्वारा आश्रम अधीक्षक को संरक्षण दिया जा रहा है या फिर लेनदेन कर मामले को दबाने का प्रयास किया गया है। अन्यथा ऐसे संवेदनशील मामले पर विभाग को तुरंत जांच कर कार्यवाही करनी चाहिए। इस संबंध में जानकारी लेने के लिए सहायक आयुक्त श्रीकांत कसेर को फोन पर सम्पर्क करने का प्रयास किया गया किंतु उनके द्वारा कॉल नहीं उठाया गया और न ही व्हाट्सएप पर भेजे गए मैसेज का उनके द्वारा कोई जवाब दिया गया। ऐसे संवेदनशील मामले में विभाग की उदासीनता कई सारे शंकाओं को जन्म दे रही है।
कागजी जांच नहीं, मौके पर हो वास्तविक सत्यापन
मामले की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए आश्रम के प्रवेश एवं उपस्थिति रजिस्टर, भोजन पंजी, राशन स्टॉक, बिल-वाउचर और संबंधित भुगतान रिकॉर्ड की जांच जरूरी है। साथ ही बच्चों की वास्तविक उपस्थिति की पुष्टि कर अभिभावकों से भी जानकारी ली जानी चाहिए। अधीक्षक की उपस्थिति और दोनों संस्थानों में उनके दायित्वों के निर्वहन की भी रिकॉर्ड के आधार पर जांच होनी चाहिए।
यदि जांच में अनियमितता या शासकीय संसाधनों के दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार व्यक्तियों पर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
अब विभाग को देना होगा जवाब
आदिवासी बच्चों की शिक्षा, आवास और भोजन से जुड़ा मामला होने के कारण इसे सामान्य प्रशासनिक शिकायत मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बच्चों के हितों की रक्षा और सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करना विभाग की जिम्मेदारी है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आधार स्तंभ द्वारा मामला उठाए जाने के बाद सहायक आयुक्त कब संज्ञान लेते हैं और जांच के लिए क्या कदम उठाते हैं। विभाग की चुप्पी पर उठ रहे सवालों का जवाब तथ्यों, जांच और कार्रवाई से ही मिल सकता है।




