कोरबा जिला खासकर नगर निगम क्षेत्र में इन दिनों नेम और फेम की राजनीति, सामान्य सभा में उठ चुका है मुद्दा, कांग्रेस के नक्शे कदम पर चल रही भाजपा,

Must Read

कोरबा(आधार स्तम्भ) :  कोरबा जिला खासकर नगर निगम क्षेत्र में इन दिनों नेम और फेम की राजनीति खूब हो रही है। पोस्टर-फ्लैक्स, सोशल मीडिया, विज्ञापन प्रचार में अपने आप को प्रमुखता से दिखाने की मची होड़ ने फेम की राजनीति को बढ़ावा दिया है तो दूसरी तरफ शिलालेखों में नाम की राजनीति प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए हावी हो रही है।

जिसकी लाठी उसी की भैंस की तर्ज पर इन दिनों शहर व जिला की भाजपा राजनीति चल रही है। ऐसी राजनीति की वजह से अपने-अपने लोगों को आगे लाकर तवज्जो देने के साथ ही इनके जरिए अपनी जमीन भावी चुनाव के मद्देनजर मजबूत करने की भी कवायद होने लगी है। कुछ ऐसे ही राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के वशीभूत होने के कारण अब शिलालेखों का प्रोटोकॉल टूटने लगा है। किसी भी सरकारी कार्य का भूमि पूजन/ शिलान्यास हो या लोकार्पण, इसमें निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को ही स्थान दिया जाता रहा है। यह प्रोटोकॉल वर्षों से प्रशासनिक दायरे में चला आ रहा है लेकिन इस प्रोटोकॉल से परे हटकर पूरे प्रदेश में किसी जिले में यदि काम हो रहा है तो वह कोरबा जिला है। दूसरे किसी भी जिले में ऐसी शिलालेख की राजनीति हमारी जानकारी में नहीं हो रही है। जो कोरबा में देखने को मिल रहा है,वह स्वस्थ परम्परा नहीं है।

निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच और राजनीतिक दल के किसी भी पदाधिकारी का नाम किसी भी सूरत में नहीं लिखा जाता लेकिन यह सब धड़ल्ले से चल रहा है। भारतीय जनता पार्टी के जिला अध्यक्ष राजनीतिक दल के प्रतिनिधि हैं और उनका नाम प्राय: सभी शिलालेखों में सभापति के बाद दर्ज हो रहा है। उनके नीचे वार्ड के पार्षद, एमआईसी सदस्य से शामिल हो रहे हैं। जानकार लोग इस तरह के रवैया को नाजायज और प्रोटोकॉल का खुला उल्लंघन करार दे रहे हैं। अचरज तो इस बात का है कि अब जिला अध्यक्ष के साथ-साथ मंडल अध्यक्ष का भी नाम शिलालेख में लिखा जाने लगा है, तो आखिर टूटते प्रोटोकॉल के पीछे कौन सी राजनीतिक शक्ति प्रबल होकर काम कर रही है..? जिस पर प्रशासनिक नियम कमजोर साबित हो रहे हैं।

 सामान्य सभा में उठ चुका है मुद्दा, कांग्रेस के नक्शे कदम पर चल रही भाजपा

शिलालेखों के प्रोटोकॉल का उल्लंघन का मामला नगर पालिक निगम की सामान्य सभा की बैठक में उठ चुका है। एक पार्षद ने इस मामले को जब सदन में उठाया, तब सभापति नूतन सिंह ठाकुर ने प्रोटोकॉल का पालन करने के निर्देश दिए। हालांकि उठाये गए सवाल पर सत्तापक्ष की ओर से जवाब आया कि पिछले कार्यकाल में कांग्रेस के लोगों ने भी ऐसा किया था, हम कर रहे हैं तो गलत क्या हुआ? इस जवाब को लेकर निगम के गलियारे और शहर राजनीति में काफी चर्चा भी रही कि कांग्रेस को धुर विरोधी मानने वाली भाजपा अपने नाम के लिए उसके रास्ते को अपना रही है तो भला दूसरे मामलों में कांग्रेस का अनुसरण क्यों नहीं किया जाता!

यह होता है नाम लेखन का क्रम,यहां चल रहा विशेषाधिकार

जिला के एक प्रशासनिक अधिकारी ने बताया कि प्रोटोकॉल के तहत कैबिनेट मंत्री, सांसद, महापौर, सभापति, एमआईसी मेम्बर और पार्षद के बाद ही अन्य जनप्रतिनिधि/गणमान्य नागरिक का नाम शामिल हो सकता है लेकिन राजनीतिक दल के पदाधिकारी का नाम शिलालेख में नहीं रहता। अब यदि नई परम्परा जबरन चला भी रहे हैं तो जिलाध्यक्ष का स्थान लास्ट में हो सकता है। इसी प्रकार पंचायत क्षेत्र में यदि कोई शिलालेख स्थापित हो रहा है तो वहां कैबिनेट मंत्री, सांसद, जिला पंचायत अध्यक्ष, जिला पंचायत सदस्य, जनपद सदस्य, सरपंच, पंच का नाम क्रमशः लिखा जाता है। एक जानकार ने बताया कि पिछले कांग्रेस कार्यकाल के समय इस परंपरा को अपने हिसाब से थोड़ा बहुत बदला गया था और प्रथम नागरिक के विशेष अधिकार के कारण शिलालेख में जिला अध्यक्ष का नाम कुछ ही स्थान पर अंकित कराया गया था। हालांकि वह भी गलत था और अभी जो हो रहा है वह भी गलत है। कायदे से तो किसी भी शिलालेख में राजनीतिक दल का नाम आना ही नहीं चाहिए। वैसे भाजपा शासन काल में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ इक्का-दुक्का ही जिला अध्यक्ष का नाम लिखने का काम पहले भी नगण्य ही पत्थरों पर (ग्रामीण क्षेत्र में) हुआ है पर वर्तमान की तरह धुँआधार नहीं और मण्डल अध्यक्ष तो बिल्कुल भी नहीं।

Latest News

रायगढ़ में एनडीपीएस एक्ट पर एक दिवसीय कार्यशाला, पुलिसकर्मियों को दिए गए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश

रायगढ़, (आधार स्तम्भ) :  रायगढ़ जिले में पुलिसकर्मियों की विवेचना क्षमता को मजबूत बनाने और एनडीपीएस एक्ट के प्रकरणों...

More Articles Like This

- Advertisement -